Wednesday, November 28, 2012

दिल्ली

तू ही दिल है, 
तू  दिल्लगी, 
अब दिल की लगी, हूँ  
करने आया! 

तेरा बन के, या 
बन के पराया,
तेरे साये में, 
बिताने आया, अपनी 
हर धूप -छाया !

अपनो को, 
करके पराया, 
किसमत को अपनी,
तराजू पे रख के, 
हे दिल्ली! मैं 
तुझसे 
मिलने आया!

3 comments:

Bikramjit said...

hmmmm to kya kaha Dehli ne aapse


I hope you are having fun in delhi then


Bikram's

gurufrequent said...

@bikramjit....poem likhi just...abhi toh bangalore mei hi hoo :)

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' said...

सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं